परमहंस योगानन्दजी का सम्पूर्ण साहित्य

परमहंस योगानन्दजी के जन्म से एक शताब्दी पश्चात उनकी मान्यता हमारे समय की परम विशिष्ट आध्यात्मिक विभूतियों में से एक के रूप में होने लगी है। उनके जीवन एवं कार्य का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है। दशकों पहले उनके द्वारा प्रारम्भ किए गए बहुत से धार्मिक एवं दार्शनिक विचार एवं विधियाँ अब शिक्षा, मनोविज्ञान, व्यवसाय, औषधि एवं प्रयास के अन्य क्षेत्रों में व्यक्त हो रहे हैं और इस प्रकार मानव जीवन की अधिक संपूर्ण, मानवोचित तथा आध्यात्मिक झांकी प्रस्तुत करने में व्यापक ढंग से योगदान प्रदान कर रहे हैं।

यह तथ्य कि परमहंस योगानन्दजी की शिक्षाओं को समझा जा रहा है और उन्हें रचनात्मक ढंग से कई अलग-अलग क्षेत्रों में प्रयोग में लाया जा रहा है, तथा विविध दार्शनिक एवं आध्यात्मिक आंदोलनों के प्रतिपादक भी उनका प्रयोग कर रहे हैं, न केवल उनकी शिक्षाओं की महान व्यावहारिक उपयोगिता की ओर संकेत करता है, अपितु यह इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है कि भविष्य में उनके द्वारा छोड़ी गई आध्यात्मिक संपदा को, समय बीतने के साथ-साथ क्षीण होने, विखंडित होने एवं विकृत होने से बचाने के लिए कुछ उपायों की आवश्यकता है।

परमहंस योगानन्दजी के बारे में जानकारी देने वाले स्रोतों की बढ़ती हुई विविधता के कारण कभी-कभी पाठकगण पूछते हैं कि यह निश्चित रूप से कैसे जाना जाए कि कोई प्रकाशन परमहंसजी के जीवन एवं शिक्षाओं को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करता है। इन जिज्ञासाओं के उत्तर में हम यह स्पष्ट करना चाहेंगे कि अपनी शिक्षाओं के प्रचार के लिए तथा भावी पीढ़ियों के लिए उनकी शुद्धता एवं सत्यनिष्ठता को सुरक्षित रखने के लिए परमहंसजी ने योगदा सत्संग सोसाइटी (वाईएसएस)/सेल्फ़-रियलाइजे़शन फे़लोशिप (एसआरएफ़) की स्थापना की थी। उन्होंने स्वयं उन अंतरंग शिष्यों को चुना एवं प्रशिक्षित किया जो कि इस समय योगदा सत्संग सोसाइटी/सेल्फ़-रियलाइजे़शन फे़लोशिप प्रकाशन परिषद का नेतृत्व करते हैं, और अपने प्रवचनों, लेखों, और योगदा सत्संग पाठों की तैयारी एवं प्रकाशन के लिए उनको विशेष अनुदेश दिए। वाईएसएस/एसआरएफ़ प्रकाशन परिषद के सदस्य इन अनुदेशों का पवित्र आस्था के रूप में सम्मान करते हैं, जिससे कि इन परमप्रिय जगद्गुरु का विश्वजनीन संदेश अपनी मूल शक्ति एवं प्रमाणिकता में बना रहे।

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया/सेल्फ़-रियलाइजे़शन फे़लोशिप का नाम और उनका प्रतीक चिह्न (जैसा कि ऊपर मुद्रित है) परमहंस योगानन्दजी ने अपने विश्वव्यापी आध्यात्मिक एवं लोकोपकारी कार्य को चलाने के लिये स्थापित संस्था की पहचान के लिए बनाए थे। यह आश्वासन देने के लिए कि इन वस्तुओं का निर्माण परमहंस योगानन्दजी द्वारा स्थापित संस्था ने किया है, और इसमें प्रस्तुत साहित्य उनकी शिक्षाओं को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करता है, जैसा कि वे स्वयं चाहते थे, ये नाम और चिह्न सभी वाईएसएस/एसआरएफ़ पुस्तकों, ऑडियो एवं वीडिओ रिकॉर्डों, फिल्मों और अन्य प्रकाशनों पर मुद्रित रहते हैं।

योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया के सभी प्रमुख प्रकाशनों के मुखपृष्ठ पर एक होलोग्राम लगा होता है। यदि ऐसा है, तो पाठक आश्वस्त रह सकता है कि इसका प्रकाशन श्री श्री परमहंस योगानन्द द्वारा स्थापित संस्था ने किया है, और इसमें प्रस्तुत साहित्य उनकी शिक्षाओं को, वे जैसा चाहते थे, उस रूप में प्रस्तुत करता है।

परमहंस योगानन्द : पूर्वी एवं पाश्चात्य जगत के लिए एक आदर्श योगी

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