योगी कथामृत

परमहंस योगानन्दजी की चिरप्रतिष्ठित आध्यात्मिक रचना पर एक विस्तारपूर्ण अवलोकन।

वर्ष 2021-22 में परमहंस योगानन्दजी की योगी कथामृत की पचहत्तरवीं वर्षगांठ है जोकि विश्व के सबसे प्रशंसित आध्यात्मिक श्रेण्य ग्रंथों में से एक है।

परमहंस योगानन्दजी की जीवन-यात्रा को समर्पित इस पृष्ठ पर आपका स्वागत है। इस पुस्तक ने विश्व के लाखों लोगों के मन एवं हृदय को स्पर्श किया है। करीब सात दशक से भी अधिक समय से इस पुस्तक ने अनगिनत पाठकों को भारत के प्राचीन योग-विज्ञान एवं आत्म-साक्षात्कार की वैज्ञानिक पद्धतियों से अवगत कराया है जोकि विश्व सभ्यता को दी गयी भारत की अद्वितीय एवं चिरस्थाई देन हैं।

1946 में प्रथम प्रकाशन के समय से ही अति उत्कृष्ट कृति के रूप में अभिनंदित की जा रही योगी कथामृत लगातार सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक पुस्तकों की सूची में शामिल रही है एवं अनेक पंथों के आध्यात्मिक अन्वेषकों द्वारा पढ़ी जा रही है। 1999 में इस पुस्तक को “शताब्दी की 100 सर्वोत्कृष्ट आध्यात्मिक पुस्तकों” में से एक कह कर सम्मानित किया गया।

इस पुस्तक के प्रति रुचि में निरंतर वृद्धि के कारण इसे पंद्रह प्रमुख भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषाओं में एवं दुनिया भर की पचास से अधिक भाषाओं में अनुदित एवं प्रकाशित किया गया है।

हार्डबॉउन्ड, पेपरबैक, ऑडियो एवं ई- बुक प्रारूप में उपलब्ध

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सर बेन किंग्सले, जिन्होंने “गांधी” फिल्म के लिए अकादमी अवार्ड प्राप्त किया, की वाणी में पढ़ी गयी ।

पुस्तक का पूर्व अवलोकन

सबसे प्रेरक प्रसंग

एक अद्वितीय लेखक, एक अनोखी पुस्तक, और एक अनूठा सन्देश

निकट शिष्यों की कहानियां

53 विश्व भाषाओँ में अनुदित

योगी कथामृत की रचना

इसके लेखन की भविष्यवाणी तो बहुत पहले ही कर दी गई थी। आधुनिक समय में योग के पुनर्जागरण के आरम्भिक व्यक्तियों में से एक, उन्नीसवीं शताब्दी के गुरु श्रद्धेय लाहिड़ी महाशय ने पहले ही कह दिया था: “पश्चिम में योग के प्रति गहरी रुचि पैदा होने के कारण मेरे देहत्याग के पचास वर्ष बाद मेरा एक जीवन चरित्र लिखा जाएगा। योग का संदेश सारे विश्व में फैल जाएगा। इससे सभी के एकमात्र परमपिता की प्रत्यक्ष अनुभूति पर आधारित एकता के कारण मानव जाति में विश्व बंधुत्व स्थापित होने में सहायता होगी।”

कई वर्ष पश्चात् लाहिड़ी महाशय के उन्नत शिष्य स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने यह भविष्यवाणी श्री योगानन्दजी को बतायी।

एक गहन आश्वासन

पुस्तक के अंतिम अध्याय में परमहंस योगानन्दजी लिखते हैं :

“ईश्वर प्रेम है : सृष्टि के लिये उनकी योजना केवल प्रेम में ही निहित हो सकती है। क्या यह सरल विचार मानव हृदय को विद्धतापूर्ण तर्कों की अपेक्षा अधिक सान्त्वना नहीं देता है? प्रत्येक वह सन्त जो परम-सत्य के मर्म तक पहुँच गया है, यह प्रमाणित कर चुका है कि एक दिव्य सार्वभौमिक योजना का अस्तित्व है और यह सुन्दर तथा आनन्दपूर्ण है।”

हमारी यह आशा है कि भारत के संतों के पारलौकिक सत्य में एक गहरी आस्था के साथ आप अपनी आत्मा को उन्मुक्त होता पाएंगे। और वह आस्था कठिनाइयों के समय, एवं सच्चे सुख तथा तृप्ति की खोज में आपको सहारा देती है।

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